गर्द उड़ी आशिक़ की तुर्बत से तो झुँझला कर कहा
वाह सर चढ़ने लगी पाँव की ठुकराई हुई
अमीर मीनाई
गिरह से कुछ नहीं जाता है पी भी ले ज़ाहिद
मिले जो मुफ़्त तो क़ाज़ी को भी हराम नहीं
अमीर मीनाई
हाथ रख कर मेरे सीने पे जिगर थाम लिया
तुम ने इस वक़्त तो गिरता हुआ घर थाम लिया
अमीर मीनाई
है वसिय्यत कि कफ़न मुझ को इसी का देना
हाथ आ जाए जो उतरा हुआ पैराहन-ए-दोस्त
अमीर मीनाई
हम जो पहुँचे तो लब-ए-गोर से आई ये सदा
आइए आइए हज़रत बहुत आज़ाद रहे
अमीर मीनाई
हटाओ आइना उम्मीद-वार हम भी हैं
तुम्हारे देखने वालों में यार हम भी हैं
अमीर मीनाई
हिलाल ओ बद्र दोनों में 'अमीर' उन की तजल्ली है
ये ख़ाका है जवानी का वो नक़्शा है लड़कपन का
अमीर मीनाई

