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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

राह के तालिब हैं पर बे-राह पड़ते हैं क़दम
देखिए क्या ढूँढते हैं और क्या पाते हैं हम

अल्ताफ़ हुसैन हाली




रोना है ये कि आप भी हँसते थे वर्ना याँ
तअ'न-ए-रक़ीब दिल पे कुछ ऐसा गिराँ न था

अल्ताफ़ हुसैन हाली




सदा एक ही रुख़ नहीं नाव चलती
चलो तुम उधर को हवा हो जिधर की

अल्ताफ़ हुसैन हाली




सख़्त मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम
हम भी आख़िर को जी चुराने लगे

अल्ताफ़ हुसैन हाली




शहद-ओ-शकर से शीरीं उर्दू ज़बाँ हमारी
होती है जिस के बोले मीठी ज़बाँ हमारी

अल्ताफ़ हुसैन हाली




ताज़ीर-ए-जुर्म-ए-इश्क़ है बे-सर्फ़ा मोहतसिब
बढ़ता है और ज़ौक़-ए-गुनह याँ सज़ा के ब'अद

अल्ताफ़ हुसैन हाली




तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़

अल्ताफ़ हुसैन हाली