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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

वो भी न आया उम्र-ए-गुज़िश्ता के मिस्ल ही
हम भी खड़े रहे दर-ओ-दीवार की तरह

सरफ़राज़ ख़ालिद




वो चेहरा मुझे साफ़ दिखाई नहीं देता
रह जाती हैं सायों में उलझ कर मिरी आँखें

सरफ़राज़ ख़ालिद




वो मुज़्तरिब था बहुत मुझ को दरमियाँ कर के
सो पा लिया है उसे ख़ुद को राएगाँ कर के

सरफ़राज़ ख़ालिद




ये काएनात भी क्या क़ैद-ख़ाना है कोई
ये ज़िंदगी भी कोई तर्ज़-ए-इंतिक़ाम है क्या

सरफ़राज़ ख़ालिद




ये काएनात भी क्या क़ैद-ख़ाना है कोई
ये ज़िंदगी भी कोई तर्ज़-ए-इंतिक़ाम है क्या

सरफ़राज़ ख़ालिद




ज़ीस्त की यकसानियत से तंग आ जाते हैं सब
एक दिन तू भी मिरी बातों से उकता जाएगा

सरफ़राज़ ख़ालिद




आईना चुपके से मंज़र वो चुरा लेता है
तू सजाता है बदन जब कभी उर्यानी से

सरफ़राज़ नवाज़