सियाह रात के पहलू में जिस्म के अंदर
किसी गुनाह की ख़्वाहिश को पालते रहना
सरफ़राज़ ख़ालिद
सियाह रात के पहलू में जिस्म के अंदर
किसी गुनाह की ख़्वाहिश को पालते रहना
सरफ़राज़ ख़ालिद
सुनते हैं बयाबाँ भी कभी शहर रहा था
सो शहर भी इक रोज़ बयाबान रहेगा
सरफ़राज़ ख़ालिद
तमाम उम्र ब-क़ैद-ए-सफ़र रहा हूँ मैं
तवाफ़ फिर किसी काबे का कर रहा हूँ मैं
सरफ़राज़ ख़ालिद
तमाम उम्र ब-क़ैद-ए-सफ़र रहा हूँ मैं
तवाफ़ फिर किसी काबे का कर रहा हूँ मैं
सरफ़राज़ ख़ालिद
तिरी दुआएँ भी शामिल हैं कोशिशों में मिरी
मुसीबतों का न टलना अजीब लगता है
सरफ़राज़ ख़ालिद
तो देखें और किसी को जो वो नहीं मौजूद
तो जाएँ और कहीं उस ने जब पुकारा नहीं
सरफ़राज़ ख़ालिद

