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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

गो हम शराब पीते हमेशा हैं दे के नक़्द
लेकिन मज़ा कुछ और ही पाया उधार में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी




हैं वही इंसाँ उठाते रंज जो होते ही कज
टेढ़ी हो कर डूबती है नाव अक्सर आब में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी




जब बोसा ले के मुद्दआ' मैं ने बयाँ किया
बोले ज़ियादा पाँव पसारा न कीजिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी




जब बोसा ले के मुद्दआ' मैं ने बयाँ किया
बोले ज़ियादा पाँव पसारा न कीजिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी




जो मुँह से कहते हैं कुछ और करते हैं कुछ और
वही ज़माना में कुछ इख़्तियार रखते हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी




काबा को अगर मानें कि अल्लाह का घर है
बुत-ख़ाना में भी शैख़ नहीं कोई मकीं और

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी




काबा को अगर मानें कि अल्लाह का घर है
बुत-ख़ाना में भी शैख़ नहीं कोई मकीं और

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी