मज़ा देखा किसी को ऐ परी-रू मुँह लगाने का
अब आईना भी कहता है कि मैं मद्द-ए-मुक़ाबिल हूँ
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
मज़ा देखा किसी को ऐ परी-रू मुँह लगाने का
अब आईना भी कहता है कि मैं मद्द-ए-मुक़ाबिल हूँ
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
न चलो मुझ से तुम रक़ीबो चाल
उँगलियों पर तुम्हें नचा दूँगा
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
फाड़ कर ख़त उस ने क़ासिद से कहा
कोई पैग़ाम ज़बानी और है
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
फाड़ कर ख़त उस ने क़ासिद से कहा
कोई पैग़ाम ज़बानी और है
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
पीते हैं जो शराब मस्जिद में
ऐसे लोगों को पारसा कहिए
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
शैख़ चल तू शराब-ख़ाने में
मैं तुझे आदमी बना दूँगा
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

