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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

गुलों के रूप में बिखरे हैं हर तरफ़ काँटे
चले जो कोई तो दामन ज़रा बचा के चले

सलाम संदेलवी




गुल-ओ-ग़ुंचा अस्ल में हैं तिरी गुफ़्तुगू की शक्लें
कभी खुल के बात कह दी कभी कर दिया इशारा

सलाम संदेलवी




है तिश्ना-लबी लेकिन हम क्यूँ उसे ज़हमत दें
अपना ही लहू पी लें साक़ी को जगाएँ क्या

सलाम संदेलवी




है तिश्ना-लबी लेकिन हम क्यूँ उसे ज़हमत दें
अपना ही लहू पी लें साक़ी को जगाएँ क्या

सलाम संदेलवी




हमेशा दूर के जल्वे फ़रेब देते हैं
है वर्ना चाँद बयाबाँ किसी को क्या मालूम

सलाम संदेलवी




हुई सुब्ह जाम खनक उठे हुई शाम नग़्मे बिखर गए
वो हसीन दिन भी थे किस क़दर जो तुम्हारे साथ गुज़र गए

सलाम संदेलवी




हुई सुब्ह जाम खनक उठे हुई शाम नग़्मे बिखर गए
वो हसीन दिन भी थे किस क़दर जो तुम्हारे साथ गुज़र गए

सलाम संदेलवी