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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

बहुत उम्मीद थी मंज़िल पे जा कर चैन पाएँगे
मगर मंज़िल पे जब पहुँचे तो नज़्म-ए-कारवाँ बदला

सलाम संदेलवी




बहुत उम्मीद थी मंज़िल पे जा कर चैन पाएँगे
मगर मंज़िल पे जब पहुँचे तो नज़्म-ए-कारवाँ बदला

सलाम संदेलवी




बिजली गिरेगी सेहन-ए-चमन में कहाँ कहाँ
किस शाख़-ए-गुलिस्ताँ पे मिरा आशियाँ नहीं

सलाम संदेलवी




चंद तिनकों के सिवा क्या था नशेमन में मिरे
बर्क़-ए-नादाँ को समझ आई बहुत देर के ब'अद

सलाम संदेलवी




चंद तिनकों के सिवा क्या था नशेमन में मिरे
बर्क़-ए-नादाँ को समझ आई बहुत देर के ब'अद

सलाम संदेलवी




दिल की धड़कन भी है उन को नागवार
उन से कुछ कहने की जुरअत क्या करें

सलाम संदेलवी




गुलों के रूप में बिखरे हैं हर तरफ़ काँटे
चले जो कोई तो दामन ज़रा बचा के चले

सलाम संदेलवी