यूँही दिल ने चाहा था रोना-रुलाना
तिरी याद तो बन गई इक बहाना
साहिर लुधियानवी
ज़मीं ने ख़ून उगला आसमाँ ने आग बरसाई
जब इंसानों के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुज़री
साहिर लुधियानवी
ऐ शम्अ' अहल-ए-बज़्म तो बैठे ही रह गए
कहने की थी जो बात वो परवाना कह गया
साहिर सियालकोटी
बढ़ी है ख़ाना-ए-दिल में कुछ और तारीकी
चराग़-ए-इश्क़ जलाया था रौशनी के लिए
साहिर सियालकोटी
गुलों को तोड़ते हैं सूँघते हैं फेंक देते हैं
ज़ियादा भी नुमाइश हुस्न की अच्छी नहीं होती
साहिर सियालकोटी
होती है दूसरों को हमेशा ये नागवार
अपने सिवा किसी को नसीहत न कीजिए
साहिर सियालकोटी
होती है दूसरों को हमेशा ये नागवार
अपने सिवा किसी को नसीहत न कीजिए
साहिर सियालकोटी

