हर इक की है पसंद अपनी हर इक का है मिज़ाज अपना
वफ़ा मुझ को पसंद आई पसंद आई जफ़ा उस को
राणा गन्नौरी
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हर शख़्स यहाँ साहिब-ए-इदराक नहीं है
हर शख़्स को तुम साहिब-ए-इदराक न कहना
राणा गन्नौरी
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हर शख़्स यहाँ साहिब-ए-इदराक नहीं है
हर शख़्स को तुम साहिब-ए-इदराक न कहना
राणा गन्नौरी
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ख़ुद तराशना पत्थर और ख़ुदा बना लेना
आदमी को आता है क्या से क्या बना लेना
राणा गन्नौरी
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ख़ुशी हम से किनारा कर रही है
हमें ग़म को भी अपनाना पड़ेगा
राणा गन्नौरी
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ख़ुशी हम से किनारा कर रही है
हमें ग़म को भी अपनाना पड़ेगा
राणा गन्नौरी
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मसअले हल करते करते आदमी का ज़ेहन भी
बे-तरह उलझा हुआ इक मसअला हो जाएगा
राणा गन्नौरी
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