कूचा-ए-यार मरकज़-ए-अनवार
अपने दामन में दश्त-ए-ग़म की ख़ाक
क़ाबिल अजमेरी
मैं अपने ग़म-ख़ाना-ए-जुनूँ में
तुम्हें बुलाना भी जानता हूँ
क़ाबिल अजमेरी
मुझे तो इस दर्जा वक़्त-ए-रुख़्सत सुकूँ की तल्क़ीन कर रहे हो
मगर कुछ अपने लिए भी सोचा मैं याद आया तो क्या करोगे
क़ाबिल अजमेरी
रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इंक़लाब
चंद शम्ओं के भड़कने से सहर होती नहीं
क़ाबिल अजमेरी
रास्ता है कि कटता जाता है
फ़ासला है कि कम नहीं होता
क़ाबिल अजमेरी
तज़ाद-ए-जज़्बात में ये नाज़ुक मक़ाम आया तो क्या करोगे
मैं रो रहा हूँ तुम हँस रहे हो मैं मुस्कुराया तो क्या करोगे
क़ाबिल अजमेरी
तुम को भी शायद हमारी जुस्तुजू करनी पड़े
हम तुम्हारी जुस्तुजू में अब यहाँ तक आ गए
क़ाबिल अजमेरी

