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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

इक अदना सा पर्दा है इक अदना सा तफ़ावुत
मख़्लूक़ में माबूद में बंदे में ख़ुदा में

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़




जाँ घुल चुकी है ग़म में इक तन है वो भी मोहमल
मअ'नी नहीं हैं बिल्कुल मुझ में अगर बयाँ हूँ

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़




जुनूँ होता है छा जाती है हैरत
कमाल-ए-अक़्ल इक दीवाना-पन है

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़




कभी न जाएगा आशिक़ से देख-भाल का रोग
पिलाओ लाख उसे बद-मज़ा दवा-ए-फ़िराक़

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़




किस तरह कर दिया दिल-ए-नाज़ुक को चूर-चूर
इस वाक़िआ' की ख़ाक है पत्थर को इत्तिलाअ'

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़




किसी के संग-ए-दर से एक मुद्दत सर नहीं उट्ठा
मोहब्बत में अदा की हैं नमाज़ें बे-वुज़ू बरसों

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़




कुछ तो कमी हो रोज़-ए-जज़ा के अज़ाब में
अब से पिया करेंगे मिला कर गुलाब में

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़