इंतिज़ाम-ए-रोज़-ए-इशरत और कर ऐ ना-मुराद
ईद आती ही रही माह-ए-सियाम आ ही गया
नातिक़ गुलावठी
इस ख़ाक-दान-ए-दहर में घुटता अगर है दम
मक़्दूर हो तो आग लगा दे हवा न माँग
नातिक़ गुलावठी
जी चुराने की नहीं शर्त दिल-ए-ज़ार यहाँ
रंज उठाने ही की ठहरी है तो फिर दिल से उठा
नातिक़ गुलावठी
जो बला आती है आती है बला की 'नातिक़'
मेरी मुश्किल का तरीक़ा नहीं आसाँ होना
नातिक़ गुलावठी
जुरअत-अफ़ज़ा-ए-सवाल ऐ ज़हे अंदाज़-ए-जवाब
आती जाती है अब इस बुत की नहीं हाँ के क़रीब
नातिक़ गुलावठी
कहने वाले वो सुनने वाला मैं
एक भी आज दूसरा न हुआ
नातिक़ गुलावठी
कैफ़ियत-ए-तज़ाद अगर हो न बयान-ए-शे'र में
'नातिक़' इसी पे रोए क्यूँ चंग-नवाज़ गाए क्यूँ
नातिक़ गुलावठी

