कल जो था वो आज नहीं जो आज है कल मिट जाएगा
रूखी-सूखी जो मिल जाए शुक्र करो तो बेहतर है
नासिर काज़मी
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कौन अच्छा है इस ज़माने में
क्यूँ किसी को बुरा कहे कोई
नासिर काज़मी
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कुछ यादगार-ए-शहर-ए-सितमगर ही ले चलें
आए हैं इस गली में तो पत्थर ही ले चलें
नासिर काज़मी
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मैं हूँ रात का एक बजा है
ख़ाली रस्ता बोल रहा है
नासिर काज़मी
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मैं इस जानिब तू उस जानिब
बीच में पत्थर का दरिया था
नासिर काज़मी
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मैं सोते सोते कई बार चौंक चौंक पड़ा
तमाम रात तिरे पहलुओं से आँच आई
नासिर काज़मी
मैं तो बीते दिनों की खोज में हूँ
तू कहाँ तक चलेगा मेरे साथ
नासिर काज़मी
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