वो सर्दियों की धूप की तरह ग़ुरूब हो गया
लिपट रही है याद जिस्म से लिहाफ़ की तरह
मुसव्विर सब्ज़वारी
देखा नहीं उस को कितने दिन से
उँगली पे किया हिसाब हम ने
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
किसी का नाम न लूँ और ग़ज़ल के पर्दे में
बयान उस की मैं सारी सिफ़ात भी कर लूँ
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
मैं अगर चुप हूँ ये बहता हुआ दरिया क्या है
लब-कुशा हूँ तो मिरी बात से पहले क्या था
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
बुझे हुए दर-ओ-दीवार देखने वालो
उसे भी देखो जो इक उम्र याँ गुज़ार गया
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
दिल एक और हज़ार आज़माइशें ग़म की
दिया जला तो था लेकिन हवा की ज़द पर था
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
हज़ार बार ख़ुद अपने मकाँ पे दस्तक दी
इक एहतिमाल में जैसे कि मैं ही अंदर था
मुशफ़िक़ ख़्वाजा

