मिरी नज़र में गए मौसमों के रंग भी हैं
जो आने वाले हैं उन मौसमों से डरना क्या
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
नज़र चुरा के वो गुज़रा क़रीब से लेकिन
नज़र बचा के मुझे देखता भी जाता था
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
ये हाल है मिरे दीवार-ओ-दर की वहशत का
कि मेरे होते हुए भी मकान ख़ाली है
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
ये लम्हा लम्हा ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश का हासिल है
कि लहज़ा लहज़ा अपने आप ही में मर रहा हूँ मैं
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
वो सुन सकें कोई उनवाँ इसी लिए हम ने
बदल बदल के उन्हें दास्ताँ सुनाई है
मुशीर झंझान्वी
हाथ जो खोला तो बच्चा रो पड़ा
बंद मुट्ठी में कोई सिक्का न था
मुशताक़ सदफ़
लफ़्ज़ जब तक वुज़ू नहीं करते
हम तिरी गुफ़्तुगू नहीं करते
मुश्ताक़ शाद

