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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

चेहरे की चाँदनी पे न इतना भी मान कर
वक़्त-ए-सहर तू रंग कभी चाँद का भी देख

मुर्तज़ा बिरलास




दुश्मन-ए-जाँ ही सही दोस्त समझता हूँ उसे
बद-दुआ जिस की मुझे बन के दुआ लगती है

मुर्तज़ा बिरलास




माना कि तेरा मुझ से कोई वास्ता नहीं
मिलने के ब'अद मुझ से ज़रा आइना भी देख

मुर्तज़ा बिरलास




मुझे की गई है ये पेशकश कि सज़ा में होंगी रियायतें
जो क़ुसूर मैं ने किया नहीं वो क़ुबूल कर लूँ दबाव में

मुर्तज़ा बिरलास




आँखें यूँ बरसीं पैराहन भीग गया
तेरे ध्यान में सारा सावन भीग गया

मुसव्विर सब्ज़वारी




अपने होने का कुछ एहसास न होने से हुआ
ख़ुद से मिलना मिरा इक शख़्स के खोने से हुआ

मुसव्विर सब्ज़वारी




अज़ाबों से टपकती ये छतें बरसों चलेंगी
अभी से क्यूँ मकीं मसरूफ़-ए-मातम हो गए हैं

मुसव्विर सब्ज़वारी