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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

मिरी जानिब को करवट ले के गर मुझ से लिपट जाओ
अभी देने लगे मिरी तरह तुम को दुआ करवट

मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता




मुझ को रोते देख कर पास आए वो तफ़्हीम को
क्यूँ न दिल से दूँ दुआएँ अपने ग़ैन ओ मीम को

मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता




न शरमाओ आँखें मिला कर तो देखो
मुलाक़ात है हम से तुम से कभी की

मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता




रोता हूँ मैं तसव्वुर-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियाह में
पानी बरस रहा है जमे हैं घटा के रंग

मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता




साफ़ क्या हो सोहबत-ए-ज़ाहिर से बातिन का ग़ुबार
मुँह नज़र आता नहीं आईना-ए-तस्वीर में

मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता




सरिश्क-ए-चश्म दिखाते हैं गर्मियाँ अपनी
कमी पे जब अरक़-ए-इंफ़िआ'ल होता है

मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता




वो हवा-ख़्वाह-ए-नसीम-ए-ज़ुल्फ़ हूँ मैं तीरा-बख़्त
क्यूँ न मरक़द पर करे दूद-ए-चराग़-ए-शाम रक़्स

मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता