मुझ से बहुत क़रीब है तू फिर भी ऐ 'मुनीर'
पर्दा सा कोई मेरे तिरे दरमियाँ तो है
मुनीर नियाज़ी
'मुनीर' अच्छा नहीं लगता ये तेरा
किसी के हिज्र में बीमार होना
मुनीर नियाज़ी
'मुनीर' इस ख़ूबसूरत ज़िंदगी को
हमेशा एक सा होना नहीं है
मुनीर नियाज़ी
'मुनीर' इस मुल्क पर आसेब का साया है या क्या है
कि हरकत तेज़-तर है और सफ़र आहिस्ता आहिस्ता
मुनीर नियाज़ी
नींद का हल्का गुलाबी सा ख़ुमार आँखों में था
यूँ लगा जैसे वो शब को देर तक सोया नहीं
मुनीर नियाज़ी
पूछते हैं कि क्या हुआ दिल को
हुस्न वालों की सादगी न गई
मुनीर नियाज़ी
क़बा-ए-ज़र्द पहन कर वो बज़्म में आया
गुल-ए-हिना को हथेली में थाम कर बैठा
मुनीर नियाज़ी

