अब शोर है मिसाल-ए-जूदी इस ख़िराम को
यूँ कौन जानता था क़यामत के नाम को
मोमिन ख़ाँ मोमिन
बहर-ए-अयादत आए वो लेकिन क़ज़ा के साथ
दम ही निकल गया मिरा आवाज़-ए-पा के साथ
मोमिन ख़ाँ मोमिन
बे-ख़ुद थे ग़श थे महव थे दुनिया का ग़म न था
जीना विसाल में भी तो हिज्राँ से कम न था
मोमिन ख़ाँ मोमिन
चारा-ए-दिल सिवाए सब्र नहीं
सो तुम्हारे सिवा नहीं होता
मोमिन ख़ाँ मोमिन
डरता हूँ आसमान से बिजली न गिर पड़े
सय्याद की निगाह सू-ए-आशियाँ नहीं
मोमिन ख़ाँ मोमिन
धो दिया अश्क-ए-नदामत ने गुनाहों को मिरे
तर हुआ दामन तो बारे पाक दामन हो गया
मोमिन ख़ाँ मोमिन
दीदा-ए-हैराँ ने तमाशा किया
देर तलक वो मुझे देखा किया
मोमिन ख़ाँ मोमिन

