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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

किस जफ़ा-कार से हम अहद-ए-वफ़ा कर बैठे
आख़िर इस बात ने इक रोज़ पशेमान किया

मोहम्मद अमान निसार




क्या फ़ुसूँ तू ने ख़ुदा जाने ये हम पर मारा
तुझ से फिरता नहीं दिल हम ने बहुत सर मारा

मोहम्मद अमान निसार




मत मुँह से 'निसार' अपने को ऐ जान बुरा कह
है साहब-ए-ग़ैरत कहीं कुछ खा के न मर जाए

मोहम्मद अमान निसार




मुझ में और उन में सबब क्या जो लड़ाई होगी
ये हवाई किसी दुश्मन ने उड़ाई होगी

मोहम्मद अमान निसार




था जिन्हें हुस्न-परस्ती से हमेशा इंकार
वो भी अब तालिब-ए-दीदार हैं किन के उन के

मोहम्मद अमान निसार




दावर-ए-हश्र मिरा नामा-ए-आमाल न देख
इस में कुछ पर्दा-नशीनों के भी नाम आते हैं

मोहम्मद दीन तासीर




हमें भी देख कि हम आरज़ू के सहरा में
खिले हुए हैं किसी ज़ख़्म-ए-आरज़ू की तरह

मोहम्मद दीन तासीर