सर्द ठिठुरी हुई लिपटी हुई सरसर की तरह
ज़िंदगी मुझ से मिली पिछले दिसम्बर की तरह
मंसूर आफ़ाक़
तिरे भुलाने में मेरा क़ुसूर इतना है
कि पड़ गए थे मुझे काम कुछ ज़ियादा ही
मंसूर आफ़ाक़
तुझ ऐसी नर्म गर्म कई लड़कियों के साथ
मैं ने शब-ए-फ़िराक़ डुबो दी शराब में
मंसूर आफ़ाक़
वो तिरा ऊँची हवेली के क़फ़स में रहना
याद आए तो परिंदों को रिहा करता हूँ
मंसूर आफ़ाक़
जो कभी दीवार पे लटकाई थी
अब तिरे कमरे की ज़ीनत भी नहीं
मंसूर ख़ुशतर
किसी से सरगुज़िश्त-ए-ग़म बयाँ करता हूँ जब अपनी
कहानी वो सरासर आप की मालूम होती है
मंसूर ख़ुशतर
नाज़-ओ-अंदाज़ की क़ीमत है तिरे मेरे सबब
किस की महफ़िल में भला और ग़ज़ब ढाओगे
मंसूर ख़ुशतर

