सुना है रात पूरे चाँद की है
समुंदर शाम से बहका हुआ है
मनीश शुक्ला
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तुझे जब देखता हूँ तो ख़ुद अपनी याद आती है
मिरा अंदाज़ हँसने का कभी तेरे ही जैसा था
मनीश शुक्ला
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उड़ानों ने किया था इस क़दर मायूस उन को
थके-हारे परिंदे जाल में ख़ुद फँस रहे थे
मनीश शुक्ला
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उसी ने राह दिखलाई जहाँ को
जो अपनी राह पर तन्हा गया था
मनीश शुक्ला
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वक़्त कहाँ मुट्ठी में आने वाला था
लेकिन हम ने बाँध लिया तस्वीरों में
मनीश शुक्ला
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ज़माने से घबरा के सिमटे थे ख़ुद में
मगर अब तो ख़ुद से भी उकता रहे हैं
मनीश शुक्ला
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ज़िंदगी देख ले नज़र भर के
हम हैं शामिल तिरे ख़राबों में
मनीश शुक्ला
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