मैं दैर ओ हरम हो के तिरे कूचे में पहुँचा
दो मंज़िलों का फेर बस ऐ यार पड़ा है
लाला माधव राम जौहर
मैं ने मिन्नत कभी की हो तो बता दें ज़ाहिद
कौन से रोज़ सिफ़ारिश को गुनहगार आया
लाला माधव राम जौहर
मय-कदा जल रहा है तेरे बग़ैर
दिल में छाले हैं आबगीने के
लाला माधव राम जौहर
मल रहे हैं वो अपने घर मेहंदी
हम यहाँ एड़ियाँ रगड़ते हैं
लाला माधव राम जौहर
मौसम-ए-बारान-ए-फ़ुर्क़त में रुलाने के लिए
मोर दिन को बोल उठता है पपीहा रात को
लाला माधव राम जौहर
मेरा ही ख़त उस शोख़ ने भेजा मिरे आगे
आख़िर जो लिखा था वही आया मिरे आगे
लाला माधव राम जौहर
मेरी ही जान के दुश्मन हैं नसीहत वाले
मुझ को समझाते हैं उन को नहीं समझाते हैं
लाला माधव राम जौहर

