शराब ग़ैर को दे कर जला न हर करवट
न दिल को आग पे तू सूरत-ए-कबाब फिरा
किशन कुमार वक़ार
तुम्हारे इश्क़-ए-अबरू में हिलाल-ए-ईद की सूरत
हज़ारों उँगलियाँ उट्ठीं जिधर से हो के हम निकले
किशन कुमार वक़ार
उखड़ी बातों से उस की साबित है
कुछ न कुछ आज ग़ैर जड़ के उठा
किशन कुमार वक़ार
यार ने ख़त्त-ओ-कबूतर के किए हैं टुकड़े
पुर्ज़े काग़ज़ के करें जम्अ' कि पर जम्अ' करें
किशन कुमार वक़ार
ज़ुल्फ़ ओ अबरू ने तो ऐ जान था बाँधा मारा
पर तिरी चश्म ने कर के मुझे बे-जाँ छोड़ा
किशन कुमार वक़ार
आँख की पुतली सब कुछ देखे देखे न अपनी ज़ात
उजला धागा मैला होवे लगें जो मैले हात
किश्वर नाहीद
अपनी बे-चेहरगी छुपाने को
आईने को इधर उधर रक्खा
किश्वर नाहीद

