तुझ से वादा अज़ीज़-तर रक्खा
वहशतों को भी अपने घर रक्खा
अपनी बे-चेहरगी छुपाने को
आईने को इधर उधर रक्खा
इक तिरा ग़म ही अपनी दौलत थी
दिल में पोशीदा बे-ख़तर रक्खा
आरज़ू ने कमाल पहचाना
और तअल्लुक़ को ताक़ पर रक्खा
इस क़दर था उदास मौसम-ए-गुल
हम ने आब-ए-रवाँ पे सर रक्खा
अपनी वारफ़्तगी छुपाने को
शौक़ ने हम को दर-ब-दर रक्खा
कलमा-ए-शुक्र कि मोहब्बत ने
हम को तम्हीद-ए-ख़्वाब पर रक्खा
उन को समझाने अपना हर्फ़-ए-सुख़न
आँसुओं को पयाम पर रक्खा

ग़ज़ल
तुझ से वादा अज़ीज़-तर रक्खा
किश्वर नाहीद