बैठे जो उस गली में न मर कर भी उट्ठे हम
इक ढेर गिर के हो गए दीवार की तरह
किशन कुमार वक़ार
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ब-क़ैद-ए-वक़्त पढ़ी मैं ने पंजगाना नमाज़
शराब पीने में कुछ एहतियात मुझ को नहीं
किशन कुमार वक़ार
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बोसा दहन का उस के न पाएँगे अपने लब
दाग़ी है मैं ने नोक ज़बान-ए-सवाल की
किशन कुमार वक़ार
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छुपता नहीं है दिल में कभी राज़ इश्क़ का
ये आग वो है जिस को नहीं ताब संग में
किशन कुमार वक़ार
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धूप में रख क़फ़स न ऐ सय्याद
साया-पर्वरदा-ए-चमन हूँ मैं
किशन कुमार वक़ार
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दिन लगे हैं ये रात को मेरी
चश्म-ए-आहू चराग़-ए-सहरा है
किशन कुमार वक़ार
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एक झूटे के वस्फ़-ए-दंदाँ में
सच्चे मोती सदा पिरोता हूँ
किशन कुमार वक़ार
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