गर हुस्न-ए-गंदुमी तिरा उन को न था पसंद
आदम ने छोड़ा किस लिए बाग़-ए-बहिश्त को
किशन कुमार वक़ार
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हाथ पिस्ताँ पे ग़ैर का पहुँचा
आप भी अब हुए अनार-फ़रोश
किशन कुमार वक़ार
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है जब से दस्त-गीर-ए-जुनूँ कू-ए-यार में
फिरता हूँ एक पाँव से परकार की तरह
किशन कुमार वक़ार
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हम बंदगान-ए-इश्क़ का मस्लक निराला है
काफ़िर की इस में वज़्अ न दीं-दार की तरह
किशन कुमार वक़ार
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हुस्न उन का अगर है संगीं-दिल
इश्क़ अपना भी सख़्त बाज़ू है
किशन कुमार वक़ार
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इमसाक में रहेगी न पाबंदी-ए-मनी
हरगिज़ नहीं हैं मुग़बचे बिंत-उल-इनब से कम
किशन कुमार वक़ार
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जिस को पास उस ने बिठाया एक दिन
उस को दुनिया से उठाया एक दिन
किशन कुमार वक़ार
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