देखा जिसे बिस्मिल क्या ताका जिसे मारा
उस आँख से डरिए जो ख़ुदा से न डरे आँख
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर लखनवी
देखना हसरत-ए-दीदार इसे कहते हैं
फिर गया मुँह तिरी जानिब दम-ए-मुर्दन अपना
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर लखनवी
एक को दो कर दिखाए आइना
गर बनाएँ आहन-ए-शमशीर से
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर लखनवी
ग़ज़ब है रूह से इस जामा-ए-तन का जुदा होना
लिबास-ए-तंग है उतरेगा आख़िर धज्जियाँ हो कर
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर लखनवी
हाल पूछो न मिरे रोने का बस जाने दो
अभी रूमाल निचोड़ूँगा तो तूफ़ाँ होगा
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर लखनवी
हाथ दिखला के ये बोला वो मुसलमाँ-ज़ादा
हो गया दस्त-ए-निगर अब तो बरहमन अपना
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर लखनवी
है चश्म नीम-बाज़ अजब ख़्वाब-ए-नाज़ है
फ़ित्ना तो सो रहा है दर-ए-फ़ित्ना बाज़ है
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर लखनवी

