निकल आए तन्हा तिरी रह-गुज़र पर
भटकने को हम कारवाँ छोड़ आए
कैफ़ अज़ीमाबादी
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तुम समुंदर की रिफ़ाक़त पे भरोसा न करो
तिश्नगी लब पे सजाए हुए मर जाओगे
कैफ़ अज़ीमाबादी
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आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है
कैफ़ भोपाली
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आप ने झूटा व'अदा कर के
आज हमारी उम्र बढ़ा दी
कैफ़ भोपाली
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चाहता हूँ फूँक दूँ इस शहर को
शहर में इन का भी घर है क्या करूँ
कैफ़ भोपाली
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चार जानिब देख कर सच बोलिए
आदमी फिरते हैं सरकारी बहुत
कैफ़ भोपाली
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चलते हैं बच के शैख़ ओ बरहमन के साए से
अपना यही अमल है बुरे आदमी के साथ
कैफ़ भोपाली
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