सब ख़त तमाम कर चुके पढ़ पढ़ के शौक़ से
वाँ थम गए जहाँ पे मिरा नाम आ गया
जावेद लख़नवी
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शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आया
वो कुछ आप ही आप शर्मा रहे हैं
जावेद लख़नवी
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सूरत न यूँ दिखाए उन्हें बार बार चाँद
पैदा करे हसीनों में कुछ ए'तिबार चाँद
जावेद लख़नवी
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तुम दिए जाओ यूँही हम को हवा दामन की
हम से बेहोश नहीं होश में आने वाले
जावेद लख़नवी
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तुम पास जो आए खो गए हम
जब तुम न मिले तो जुस्तुजू की
जावेद लख़नवी
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तुम्हें है नश्शा जवानी का हम में ग़फ़लत-ए-इश्क़
न इख़्तियार में तुम हो न इख़्तियार में हम
जावेद लख़नवी
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उम्मीद का बुरा हो समझा कि आप आए
बे-वज्ह शब को हिल कर ज़ंजीर-ए-दर ने मारा
जावेद लख़नवी
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