किस लिए कीजे बज़्म-आराई
पुर-सुकूँ हो गई है तंहाई
फिर ख़मोशी ने साज़ छेड़ा है
फिर ख़यालात ने ली अंगड़ाई
यूँ सुकूँ-आश्ना हुए लम्हे
बूँद में जैसे आए गहराई
इक से इक वाक़िआ हुआ लेकिन
न गई तेरे ग़म की यकताई
कोई शिकवा न ग़म न कोई याद
बैठे बैठे बस आँख भर आई
ढलकी शानों से हर यक़ीं की क़बा
ज़िंदगी ले रही है अंगड़ाई
ग़ज़ल
किस लिए कीजे बज़्म-आराई
जावेद अख़्तर

