चलते रहे हम तुंद हवाओं के मुक़ाबिल
'आज़ाद' चराग़-ए-तह-ए-दामाँ न रहे हम
जगन्नाथ आज़ाद
ढूँढने पर भी न मिलता था मुझे अपना वजूद
मैं तलाश-ए-दोस्त में यूँ बे-निशाँ था दोस्तो
जगन्नाथ आज़ाद
हम ने बुरा भला ही सही काम तो किया
तुम को तो ए'तिराज़ ही करने का शौक़ था
जगन्नाथ आज़ाद
इब्तिदा ये थी कि मैं था और दा'वा इल्म का
इंतिहा ये है कि इस दा'वे पे शरमाया बहुत
जगन्नाथ आज़ाद
इक बार अगर क़फ़स की हवा रास आ गई
ऐ ख़ुद-फ़रेब फिर हवस-ए-बाल-ओ-पर कहाँ
जगन्नाथ आज़ाद
इस से ज़ियादा दौर-ए-जुनूँ की ख़बर नहीं
कुछ बे-ख़बर से आप थे कुछ बे-ख़बर से हम
जगन्नाथ आज़ाद
किनारे ही से तूफ़ाँ का तमाशा देखने वाले
किनारे से कभी अंदाज़ा-ए-तूफ़ाँ नहीं होता
जगन्नाथ आज़ाद

