उड़ गई पर से ताक़त-ए-परवाज़
कहीं सय्याद अब रिहा न करे
जाफ़र अली हसरत
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मिरी तमन्ना है अब के तुम फिर मिलो तो जी भर के मुस्कुराएँ
कि देखना है ये रौशनी का सफ़र बहुत देर ब'अद जा कर
जाफ़र शिराज़ी
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आपस की गुफ़्तुगू में भी कटने लगी ज़बाँ
अब दोस्तों से तर्क-ए-मुलाक़ात चाहिए
जाफ़र ताहिर
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ऐ वतन जब भी सर-ए-दश्त कोई फूल खिला
देख कर तेरे शहीदों की निशानी रोया
जाफ़र ताहिर
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अर्सा-ए-ज़ुल्मत-ए-हयात कटे
हम-नफ़स मुस्कुरा कि रात कटे
जाफ़र ताहिर
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इक उम्र भटकते हुए गुज़री है जुनूँ में
अब कौन फ़रेब-ए-निगह-ए-यार में आए
जाफ़र ताहिर
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जब भी देखी है किसी चेहरे पे इक ताज़ा बहार
देख कर मैं तिरी तस्वीर पुरानी रोया
जाफ़र ताहिर
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