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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

तुम्हारी आँखों की गर्दिशों में बड़ी मुरव्वत है हम ने माना
मगर न इतनी तसल्लियाँ दो कि दम निकल जाए आदमी का

हनीफ़ अख़गर




वो कम-सिनी में भी 'अख़्गर' हसीन था लेकिन
अब उस के हुस्न का आलम अजीब आलम है

हनीफ़ अख़गर




याद-ए-फ़रोग़-ए-दस्त-ए-हिनाई न पूछिए
हर ज़ख़्म-ए-दिल को रश्क-ए-नमक-दाँ बना दिया

हनीफ़ अख़गर




ये सानेहा भी बड़ा अजब है कि अपने ऐवान-ए-रंग-ओ-बू में
हैं जम्अ सब महर ओ माह ओ अंजुम पता नहीं फिर भी रौशनी का

हनीफ़ अख़गर




अना अना के मुक़ाबिल है राह कैसे खुले
तअल्लुक़ात में हाइल है बात की दीवार

हनीफ़ कैफ़ी




अपने काँधों पे लिए फिरता हूँ अपनी ही सलीब
ख़ुद मिरी मौत का मातम है मिरे जीने में

हनीफ़ कैफ़ी




अपनी जानिब नहीं अब लौटना मुमकिन मेरा
ढल गया हूँ मैं सरापा तिरे आईने में

हनीफ़ कैफ़ी