वो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुए
बला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जाना
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ये ज़िल्लत-ए-इश्क़ तेरे हाथों
ऐ दोस्त तुझे कहाँ छुपा लें
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ये ज़िंदगी के कड़े कोस याद आते हैं
तिरी निगाह-ए-करम का घना घना साया
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा
और अगर रोइए तो पानी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त
तिरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई
फ़िराक़ गोरखपुरी
ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा उसी का है जहाँ में तुझ को
देख कर भी जो लिए हसरत-ए-दीदार चला
फ़िराक़ गोरखपुरी
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