नज्द से जानिब-ए-लैला जो हवा आती है
दिल-ए-मजनूँ के धड़कने की सदा आती है
तअशशुक़ लखनवी
मुंतज़िर तेरे हैं चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ खोले हुए
बैठे हैं दिल बेचने वाले दुकाँ खोले हुए
तअशशुक़ लखनवी
मुझे है फ़िक्र ख़त भेजा है जब से उस गुल-ए-तर को
हज़ारों बुलबुलें रोकेंगी रस्सी में कबूतर को
तअशशुक़ लखनवी
मुझ से लाखों ख़ाक के पुतले बना सकता है तू
मैं कहाँ से एक तेरा सा ख़ुदा पैदा करूँ
तअशशुक़ लखनवी
मुझ से क्या पूछते हो दाग़ हैं दिल में कितने
तुम को अय्याम-ए-जुदाई का शुमार आता है
तअशशुक़ लखनवी
मौज-ए-दरिया से बला की चाहिए कश्ती मुझे
हो जो बिल्कुल ना-मुवाफ़िक़ वो हवा पैदा करूँ
तअशशुक़ लखनवी
आमद आमद है ख़िज़ाँ की जाने वाली है बहार
रोते हैं गुलज़ार के दर बाग़बाँ खोले हुए
तअशशुक़ लखनवी
कभी तो शहीदों की क़ब्रों पे आओ
ये सब घर तुम्हारे बसाए हुए हैं
तअशशुक़ लखनवी
जिस तरफ़ बैठते थे वस्ल में आप
उसी पहलू में दर्द रहता है
तअशशुक़ लखनवी

