पत्तियाँ हो गईं हरी देखो
ख़ुद से बाहर भी तो कभी देखो
शीन काफ़ निज़ाम
निकले कभी न घर से मगर इस के बावजूद
अपनी तमाम उम्र सफ़र में गुज़र गई
शीन काफ़ निज़ाम
मंज़र को किसी तरह बदलने की दुआ दे
दे रात की ठंडक को पिघलने की दुआ दे
शीन काफ़ निज़ाम
मन रफ़्तार से भागता जाता है किस ओर
पलक झपकते शाम है पलक झपकते भोर
शीन काफ़ निज़ाम
मन में धरती सी ललक आँखों में आकाश
याद के आँगन में रहा चेहरे का प्रकाश
शीन काफ़ निज़ाम
कोई दुआ कभी तो हमारी क़ुबूल कर
वर्ना कहेंगे लोग दुआ से असर गया
शीन काफ़ निज़ाम
किसी के साथ अब साया नहीं है
कोई भी आदमी पूरा नहीं है
शीन काफ़ निज़ाम
आँखें कहीं दिमाग़ कहीं दस्त ओ पा कहीं
रस्तों की भीड़-भाड़ में दुनिया बिखर गई
शीन काफ़ निज़ाम
जिन से अँधेरी रातों में जल जाते थे दिए
कितने हसीन लोग थे क्या जाने क्या हुए
शीन काफ़ निज़ाम

