अगर रोते न हम तो देखते तुम
जहाँ में नाव को दरिया न होता
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अहल-ए-म'अनी जुज़ न बूझेगा कोई इस रम्ज़ को
हम ने पाया है ख़ुदा को सूरत-ए-इंसाँ के बीच
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐ ख़िरद-मंदो मुबारक हो तुम्हें फ़र्ज़ानगी
हम हों और सहरा हो और हैरत हो और दीवानगी
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐ ख़िज़ाँ भाग जा चमन से शिताब
वर्ना फ़ौज-ए-बहार आवे है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐ मुसलमानो बड़ा काफ़िर है वो
जो न होवे ज़ुल्फ़-गीराँ का मुतीअ
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐसा करूँगा अब के गरेबाँ को तार तार
जो फिर किसी तरह से किसी से रफ़ू न हो
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ऐसी हवा बही कि है चारों तरफ़ फ़साद
जुज़ साया-ए-ख़ुदा कहीं दार-उल-अमाँ नहीं
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
अनल-हक़ की हक़ीक़त को जो हो मंसूर सो जाने
कि उस को आसमाँ चढ़ने से चढ़ना दार बेहतर था
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
असीरों का नहीं कुछ शोर-ओ-ग़ुल ये आज ज़िंदाँ में
मिरे दीवाना-पन को देख कर ज़ंजीर हँसती है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

