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मुईन अहसन जज़्बी शायरी | शाही शायरी

मुईन अहसन जज़्बी शेर

29 शेर

न आए मौत ख़ुदाया तबाह-हाली में
ये नाम होगा ग़म-ए-रोज़गार सह न सका

मुईन अहसन जज़्बी




मुस्कुरा कर डाल दी रुख़ पर नक़ाब
मिल गया जो कुछ कि मिलना था जवाब

मुईन अहसन जज़्बी




मुख़्तसर ये है हमारी दास्तान-ए-ज़िंदगी
इक सुकून-ए-दिल की ख़ातिर उम्र भर तड़पा किए

मुईन अहसन जज़्बी




मिले मुझ को ग़म से फ़ुर्सत तो सुनाऊँ वो फ़साना
कि टपक पड़े नज़र से मय-ए-इशरत-ए-शबाना

मुईन अहसन जज़्बी




मेरी ही नज़र की मस्ती से सब शीशा-ओ-साग़र रक़्साँ थे
मेरी ही नज़र की गर्मी से सब शीशा-ओ-साग़र टूट गए

मुईन अहसन जज़्बी




मेरी अर्ज़-ए-शौक़ बे-मअ'नी है उन के वास्ते
उन की ख़ामोशी भी इक पैग़ाम है मेरे लिए

मुईन अहसन जज़्बी




अभी सुमूम ने मानी कहाँ नसीम से हार
अभी तो मअरका-हा-ए-चमन कुछ और भी हैं

मुईन अहसन जज़्बी




क्या मातम उन उम्मीदों का जो आते ही दिल में ख़ाक हुईं
क्या रोए फ़लक उन तारों पर दम भर जो चमक कर टूट गए

मुईन अहसन जज़्बी




कभी दर्द की तमन्ना कभी कोशिश-ए-मुदावा
कभी बिजलियों की ख़्वाहिश कभी फ़िक्र-ए-आशियाना

मुईन अहसन जज़्बी