कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं
बहुत आगे गए बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे हैं
इंशा अल्लाह ख़ान
साँवले तन पे ग़ज़ब धज है बसंती शाल की
जी में है कह बैठिए अब जय कनहय्या लाल की
इंशा अल्लाह ख़ान
सनम-ख़ाना जाता हूँ तू मुझ को नाहक़
न बहका न बहका न बहका न बहका
इंशा अल्लाह ख़ान
शैख़-जी ये बयान करो हम भी तो बारी कुछ सुनें
आप के हाथ क्या लगा ख़ल्वत-ओ-एतिकाफ़ में
इंशा अल्लाह ख़ान
सुब्ह-दम मुझ से लिपट कर वो नशे में बोले
तुम बने बाद-ए-सबा हम गुल-ए-नसरीन हुए
इंशा अल्लाह ख़ान
उस संग-दिल के हिज्र में चश्मों को अपने आह
मानिंद-ए-आबशार किया हम ने क्या किया
इंशा अल्लाह ख़ान
ये अजीब माजरा है कि ब-रोज़-ए-ईद-ए-क़ुर्बां
वही ज़ब्ह भी करे है वही ले सवाब उल्टा
इंशा अल्लाह ख़ान
ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है
ये आग इश्क़ की या-रब किधर से उतरी है
इंशा अल्लाह ख़ान
अजीब लुत्फ़ कुछ आपस के छेड़-छाड़ में है
कहाँ मिलाप में वो बात जो बिगाड़ में है
इंशा अल्लाह ख़ान

