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चकबस्त ब्रिज नारायण शायरी | शाही शायरी

चकबस्त ब्रिज नारायण शेर

20 शेर

नया बिस्मिल हूँ मैं वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से
बता दे तू ही ऐ ज़ालिम तड़पने की अदा क्या है

चकबस्त ब्रिज नारायण




किया है फ़ाश पर्दा कुफ़्र-ओ-दीं का इस क़दर मैं ने
कि दुश्मन है बरहमन और अदू शैख़-ए-हरम मेरा

चकबस्त ब्रिज नारायण




लखनऊ में फिर हुई आरास्ता बज़्म-ए-सुख़न
बाद मुद्दत फिर हुआ ज़ौक़-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे

चकबस्त ब्रिज नारायण




मंज़िल-ए-इबरत है दुनिया अहल-ए-दुनिया शाद हैं
ऐसी दिल-जमई से होती है परेशानी मुझे

चकबस्त ब्रिज नारायण




मज़ा है अहद-ए-जवानी में सर पटकने का
लहू में फिर ये रवानी रहे रहे न रहे

चकबस्त ब्रिज नारायण




ये कैसी बज़्म है और कैसे उस के साक़ी हैं
शराब हाथ में है और पिला नहीं सकते

चकबस्त ब्रिज नारायण




ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब
मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना

चकबस्त ब्रिज नारायण




ज़बान-ए-हाल से ये लखनऊ की ख़ाक कहती है
मिटाया गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने जाह-ओ-हशम मेरा

चकबस्त ब्रिज नारायण




ख़ुदा ने इल्म बख़्शा है अदब अहबाब करते हैं
यही दौलत है मेरी और यही जाह-ओ-हशम मेरा

चकबस्त ब्रिज नारायण