पैरवी से मुमकिन है कब रसाई मंज़िल तक
नक़्श-ए-पा मिटाने को गर्द-ए-राह काफ़ी है
अंबरीन हसीब अंबर
मुझ में अब मैं नहीं रही बाक़ी
मैं ने चाहा है इस क़दर तुम को
अंबरीन हसीब अंबर
मोहब्बत और क़ुर्बानी में ही ता'मीर मुज़्मर है
दर-ओ-दीवार से बन जाए घर ऐसा नहीं होता
अंबरीन हसीब अंबर
मानूस बाम-ओ-दर से नज़र पूछती रही
उन में बसे वो लोग पुराने कहाँ गए
अंबरीन हसीब अंबर
अब के हम ने भी दिया तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का जवाब
होंट ख़ामोश रहे आँख ने बारिश नहीं की
अंबरीन हसीब अंबर
क्या ख़ूब तमाशा है ये कार-गह-ए-हस्ती
हर जिस्म सलामत है हर ज़ात अधूरी है
अंबरीन हसीब अंबर
क्या जानिए क्या सोच के अफ़्सुर्दा हुआ दिल
मैं ने तो कोई बात पुरानी नहीं लिक्खी
अंबरीन हसीब अंबर
जो तुम हो तो ये कैसे मान लूँ मैं
कि जो कुछ है यहाँ बस इक गुमाँ है
अंबरीन हसीब अंबर
इस आरज़ी दुनिया में हर बात अधूरी है
हर जीत है ला-हासिल हर मात अधूरी है
अंबरीन हसीब अंबर

