EN اردو
Intezar शायरी | शाही शायरी

Intezar

93 शेर

है ऐन-ए-वस्ल में भी मिरी चश्म सू-ए-दर
लपका जो पड़ गया है मुझे इंतिज़ार का

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़




किस किस तरह की दिल में गुज़रती हैं हसरतें
है वस्ल से ज़ियादा मज़ा इंतिज़ार का

ताबाँ अब्दुल हई