मिरा रोता बच्चा बहलता था जिस से
वो लकड़ी का हाथी उठा ले गया वो
फ़े सीन एजाज़
तुझ को मंज़ूर नहीं मुझ को है अब भी मंज़ूर
मेरी क़ुर्बत मिरे बोसे मुझे वापस कर दे
फ़े सीन एजाज़
बढ़ाना हाथ पकड़ने को रंग मुट्ठी में
तो तितलियों के परों का दराज़ हो जाना
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
जब उन की बज़्म में हर ख़ास ओ आम रुस्वा है
अजीब क्या है अगर मेरा नाम रुस्वा है
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
जुगनू हवा में ले के उजाले निकल पड़े
यूँ तीरगी से लड़ने जियाले निकल पड़े
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
कैसे मुमकिन है कि क़िस्से जिस से सब वाबस्ता हों
वो चले और साथ उस के दास्ताँ कोई न हो
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी
राह में उस की चलें और इम्तिहाँ कोई न हो
कैसे मुमकिन है कि आतिश हो धुआँ कोई न हो
फ़य्याज़ फ़ारुक़ी

