अभी तलक है सदा पानियों पे ठहरी हुई
अगरचे डूब चुका है पुकारने वाला
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
दयार-ए-फ़िक्र-ओ-हुनर को निखारने वाला
कहाँ गया मिरी दुनिया सँवारने वाला
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
हर शख़्स को फ़रेब-ए-नज़र ने किया शिकार
हर शख़्स गुम है गुम्बद-ए-जाँ के हिसार में
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
मिरे जज़्बे मिरी शहादत हैं
बहते आँसू शहीद करती हूँ
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
तुम तो ख़ुद सहरा की सूरत बिखरे बिखरे लगते हो
'फ़र्रुख़' से 'फ़र्रुख़' को सोचो कैसे तुम मिलवाओगे
फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी
आसमानों पे उड़ो ज़ेहन में रक्खो कि जो चीज़
ख़ाक से उठती है वो ख़ाक पे आ जाती है
फ़रताश सय्यद
रंग-ओ-ख़ुशबू का कहीं कोई करे ज़िक्र तो बात
घूम फिर कर तिरी पोशाक पे आ जाती है
फ़रताश सय्यद

