मैं सुब्ह ख़्वाब से जागा तो ये ख़याल आया
जो रात मेरे बराबर था क्या हुआ उस का
फ़ैज़ी
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पड़ गया है ख़ुदा से काम मुझे
और ख़ुदा का कोई पता ही नहीं
फ़ैज़ी
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सोचता क्या हूँ तिरे बारे में चलते चलते
तू ज़रा पूछना ये बात ठहर कर मुझ से
फ़ैज़ी
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ज़ुल्म करता हूँ ज़ुल्म सहता हूँ
मैं कभी चैन से रहा ही नहीं
फ़ैज़ी
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जब बुलंदी पर पहुँच जाते हैं लोग
किस क़दर छोटे नज़र आते हैं लोग
फ़ैज़ी निज़ाम पुरी
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ये जो लाहौर से मोहब्बत है
ये किसी और से मोहब्बत है
फख़्र अब्बास
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आग़ाज़ तो अच्छा था 'फ़ना' दिन भी भले थे
फिर रास मुझे इश्क़ का अंजाम न आया
फ़ना बुलंदशहरी
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