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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

पागल-पन में आ कर पागल कुछ भी तो कर सकता है
ख़ुद को इज़्ज़त-दार समझने वाले मुझ से दूर रहें

फ़ैज़ आलम बाबर




जागते जागते इक उम्र कटी हो जैसे
जान बाक़ी है मगर साँस रुकी हो जैसे

फ़ैज़ अनवर




जहाँ फ़ैज़ान-ए-आबादी बहुत है
वहाँ पर भी घने जंगल रहे थे

फ़ैज़ान आरिफ़




बहुत क़दीम नहीं कल का वाक़िआ है ये
मैं इस ज़मीन पे उतरा था तेरी ज़ात के साथ

फ़ैज़ान हाशमी




बस यही सोच के रहता हूँ मैं ज़िंदा इस में
ये मोहब्बत है कोई मर नहीं सकता इस में

फ़ैज़ान हाशमी




जिस परी पर मर मिटे थे वो परी-ज़ादी न थी
ब'अद में जाना कि उस के दोनों पर होते थे हम

फ़ैज़ान हाशमी




ख़ला में गिरवी रक्खा अपने सारे ख़्वाबों को
और इस ज़मीन पे छोटा सा घर लिया मैं ने

फ़ैज़ान हाशमी