ये ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी हुई 'बिस्मिल'
न रो सके न कभी हँस सके ठिकाने से
बिस्मिल अज़ीमाबादी
अब वादा-ए-फ़र्दा में कशिश कुछ नहीं बाक़ी
दोहराई हुई बात गुज़रती है गिराँ और
बिस्मिल साबरी
जब आया ईद का दिन घर में बेबसी की तरह
तो मेरे फूल से बच्चों ने मुझ को घेर लिया
बिस्मिल साबरी
निकल के आ तो गया गहरे पानियों से मगर
कई तरह के सराबों ने मुझ को घेर लिया
बिस्मिल साबरी
वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है
अजीब शख़्स है पानी के घर में रहता है
बिस्मिल साबरी
दो दिन में हो गया है ये आलम कि जिस तरह
तेरे ही इख़्तियार में हैं उम्र भर से हम
बिस्मिल सईदी
दोहराई जा सकेगी न अब दास्तान-ए-इश्क़
कुछ वो कहीं से भूल गए हैं कहीं से हम
बिस्मिल सईदी

