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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

नहीं है ख़्वाब दीवाने का हस्ती
ये दुनिया सिर्फ़ इक धोका नहीं है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




तमाम लाला ओ गुल के चराग़ रौशन हैं
शजर शजर पे शगूफ़ों में जल रही है हवा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




तेरी तो 'बिल्क़ीस' निराली ही बातें हैं
इस दुनिया में कैसे तिरा गुज़ारा होगा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




उठ कर चले गए तो कभी फिर न आएँगे
फिर लाख तुम बुलाओ सदाएँ दिया करो

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




यूँ चुप रहा करे से तो हो जाए है जुनूँ
ज़ख़्म-ए-निहाँ कुरेद के कुछ रो लिया करो

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




ज़रा सी देर भी रुकता तो कुछ पता चलता
वो रंग था कि थी ख़ुशबू सहाब सा क्या था

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन




अब के बसंत आई तो आँखें उजड़ गईं
सरसों के खेत में कोई पत्ता हरा न था

बिमल कृष्ण अश्क